शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

मैं और मेरी केतली


मैं और मेरी केतली
          रवि के दिन कि शुरूआत चाय के केतली से होती है। क्योंकि रबि एक चाय वाला है, चाय ही उसका  सब कुछ है । सुरज उगने से पहले वह अपनी केतली को चूल्हे पर चङा देता है,तकि सुबह ठंङ के कारण चाय अधिक से अधिक बेच सके । सुबह कि चाय बेचने के बाद वह अलग-अलग ऑफिसों में चाय देने का काम करता है, जब राबि ऑफिसों मे चाय देने जाता है तो सोचता है कि काश कभी वह भी कुर्सी पर बैठ कर कागज कलम चला पाता, पर यह सब उसके नसीब मे कहां, उसके नसीब में तो चाय बेचना ही लिखा है ।  
       राबि के पिता फुट -पाथ पर चाय की रेङङी लगाते हैं और रबि ऑफिसों में जाकर चाय बेचता है। वहा ऊँची-ऊँची इमारतों में बसे छोटे-बङे ऑफिसों में हर एक को चाय देता है। रबि दस से पन्र्दह मन्जिलों वाली इमारत में ऊपर-नीचे पैदल चलकर थक जाता है, लेकिन जब यह खयाल आता है कि अगर चाय नही बेचुंगा तो शाम को क्या खाऊंगा , और निरतंर अपने कामों में लगा रहता है ।
      राबि झुग्गियों मे रहता है और वहां उसके साथ उसके माता-पिता और एक छोटी बहन रहती है। राबि कि मां उसको जन्म देने के बाद ही मर गई थी और अब वह अपनी सौतेली मां के साथ रहता है। राबि स्कूल नही जाता  और वह अपने पिता के साथ काम में हाथ बटाता है और शाम को जब थका हुआ घर आता है तो रूखी-सूखी खा कर सो जाता है, और सूबह होते ही शुरु हो जाती है उसकी रोज़ की भागदौड़ ।
        कई सरकारें आईं और गईं पर रबि और उसके पिता आज भी चाय बेचते हैं, जब हमने उन से यह पूछने कि कोशिश की कि नई सरकार आने से  आप को उन से क्या उम्मीदें हैं, तो उन्होंने कहा कि महंगाई कम हो जिनसे आम आदमी की रोज़मर्रा की जरुरतें आसानी से पूरी हो सकें।


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